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हमारे  आदि  गुरु

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समर्थ  सद्गुरु  महात्मा  श्री  रामचन्द्र  जी  महाराज  ( लालाजी )  फतेहगढ़,  उत्तर  प्रदेश.

महापुरुष  अकस्मात्  ही  नहीं  जन्मा  करते,  किन्तु  जब  समय  को  उनकी  अत्यंत  आवश्यकता  होती  है,  वे  अवतरित  होते  हैं,  अपना  कार्य  करते  हैं  और  चले  जाते  हैं  -  ऐसा  ही  प्रकृति  का  तथ्य  है  ।  भारत,  जो  सदैव  आध्यात्मिकता  का  घर  रहा  है,  अन्धकार  में  टटोल  रहा  था  और  युगों  प्राचीन  योग  पद्धति  को  पूर्णतः  भूल  चुका  था  ।  ठोस  भौतिकवाद  ने  सूक्ष्म  अध्यात्मवाद  का  स्थान  ग्रहण  कर  लिया  था  ।  अज्ञान  के  काले  बादल  सर्वत्र  मंडरा  रहे  थे  ।  यौगिक  प्राणाहुति  हिन्दुओं  के  लिये  नितान्त  पराई  बन  चुकी  थी  ।  ऐसी  दशा  में,  जब  आध्यात्मिकता  असहाय  होकर  ड़गमगा  रही  थी,  मानवता  के  उत्कर्ष  हेतु  किसी  महान  विभूति  की  बड़ी  आवश्यकता  थी  जो  चीज़ों  को  सुव्यवस्थित  कर  सके  ।

ऐसे  समय  में,  प्रकृति  की  ( ईश्वरीय )  शक्ति  मानव  आकृति  में  समर्थ  सद्गुरु  महात्मा  रामचन्द्रजी  महाराज  के  रूप  में  फर्रुखाबाद  ( उ०  प्र० )  में  उतरी  ।  इस  आध्यात्मिक  प्रतिभासंपन्न  व्यक्ति  का  जन्म  बसन्त  पञ्चमी,  २  फ़रवरी,  १८७३  को  एक  सम्माननीय  कायस्थ  परिवार  में  हुआ  था  ।  उनपर  बचपन  में  उनकी  माता  का  प्रभाव  पड़ा,  जो  कि  नेक  विचारों  वाली  एक  सरल  महिला  थीं,  और  जिनका  अधिकांश  समय  भक्ति  और  पूजा  में  व्यतीत  होता  था।  यह  उनके  ही  प्रभाव  के  कारण  था  कि  अत्यल्प  आयु  में  इन्हें  प्रेरणा  प्राप्त  हुई  ।  घटना  इस  प्रकार  है,  कि  एक  दिन  जब  वह  अपने  साथियों  के  साथ  खेल  रहे  थे,  किसी  दिव्य  शक्ति  ने  उनमें  यह  भाव  जागृत  किया  कि  वह  उस  उद्देश्  के  लिये  नहीं  जन्मे  जिसमें  कि  वह  लगे  थे  ।  आगे  के  वृहत्तर  कार्य  के  निमित्त  उन्हें  आत्मानुभूति  करना  और  अपने  को  तैयार  करना  था  ।  आत्मा  का  जागरण  हुआ  और  वह  इस  कार्य  में  पूर्ण  तन्मयता  से  लग  गये।  उन्होंने  केवल  सात  महीनों  में  पूर्णता  प्राप्त  कर  ली  -  वस्तुतः  यह  एक  अद्वितीय  उदाहरण  है  ।  तब  से  उन्होंने  आध्यात्मिकता  के  लिये  अपना  सम्पूर्ण  जीवन  समर्पित  कर  दिया  ।  वह  हमारे  आदि - गुरु  है  ।

वह  पूर्ण  रूपेण  अहंकार  से  रहित,  संयम,  सहिष्णुता  और  भक्ति  के  प्रतीक  थे  ।  उनके  साथ  प्राणाहुति  द्वारा  यौगिक  प्रशिक्षण  के  नये  युग  का  उदय  हुआ  जिस  पर  उनका  पूरा  प्रभुत्व  था  ।  केवल  एक  ही  दृष्टिपात  में  वह  व्यक्ति  को  पूर्ण  ( सिद्ध )  बनाने  में  सक्षम  थे  ।  इन्होने  ही  यह  सम्भव  किया  कि  गृहस्थाश्रम  में  पारिवारिक  जीवन  बिताते  हुए  भी,  केवल  एक  ही  जीवन  में  मनुष्य  पूर्णता  प्राप्त  कर  ले  ।  वह  कहा  करते  थे  कि  गृहस्थ - जीवन  के  कष्ट  और  दुःख  आध्यात्मिक  उपलब्धियों  के  निमित्त  तप  और  त्याग  हैं  ।  उन्होंने  बहुत  बड़े  पैमाने  पर  आध्यात्मिक  प्रशिक्षण  की  विधियों  को  सरल  बना  दिया  था  और  उन्हें  समय  की  आवश्यकताओं  के  अनुकूल  ठीक  कर  दिया  था  ।  आध्यात्मिक  क्षेत्र  की  उनकी  अगणित  खोजों  में  से  एक  का  वर्णन  "केन्द्रीय  क्षेत्र"  शीर्षकान्तर्गत  दिया  हुआ  है  ।

उन्होंने  ऐसी  उच्च  सामर्थ्य  और  आध्यात्मिक  गरिमा  से  युक्त  अपने  जीवन  का  प्रत्येक  क्षण  मानवता  के  उत्कर्ष  में  लगा  दिया  और  ३६  वर्षों  तक  मानव  सेवा  करने  के  उपरान्त  उन्होंने  ५८  वर्ष  की  आयु  में  १४  अगस्त  १९३१  को  अपना  पार्थिव  शरीर  छोड़ा  ।  वे  वस्तुतः  प्रकृति  के  विलक्षण  चमत्कार  थे  ।  जीवन  काल  में  जो  कार्य  उन्होंने  किया,  कल्पनातीत  है  ।  आगामी  पीढ़ीयाँ  यथा  समय  उनकी  योग्यता  को  जान  सकेगी  ।

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